jab-wo-muskati-thi-poet
§ 🌹 रोमांस / Romantic300 reads

jab-wo-muskati-thi-poet

┌──┐└──┘
वो जब मुस्काती थी, मानो कमल की पंखुड़ी खिल जाती थी। जिसे देखकर हर किसी की बाँछें खिल जाती थीं, और उसकी महक फ़िज़ा में बिखर जाती थी। जिस-जिस से उसकी खुशबू टकराती थी, वो फिर कभी होश में नहीं आ पाता था। ऐसी थी उसकी अदा, जिस पर सब हो जाता था फिदा। जब बालों को सहलाती थी, मानो ज़ख्म पर मरहम लगाती थी। फिर वो मुस्काती थी, जिससे ज़ख्मों में ताज़गी आ जाती थी। इतनी खूबसूरत थी वो फूल, जो हर किसी के मन को भा जाती थी।

— shayariprime.com

🔗 Share this Kavita:WhatsAppTwitter / XFacebook
∿ ∿ ∿