satta-ki-lobh-par-kavita-janta-ki-awaaz-bhrashtachar-virodhi-kavita
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सत्ता की लोभ में इतना डूब चुके हो, इंसान होकर इंसानियत से उप चुके हो। जिस दिन जाग उठेगी जनता, उस दिन सत्ता से उखड़ फेंक देगी जनता। अभी हारे हैं हम सबकी नज़रों में, पर अपनी नज़रों में हम जीत गए। सबने देखा था उसका खेल अभी, हमने तो पचीसी का पासा, अभी फेंका ही नहीं। कुछ पल के मिले पावर को पर्मानेंट समझ लिया, ये नादान तूने खुद को कितनी ऊँचाई पर समझ लिया। झूला तो कभी ऊपर, कभी नीचे जाता है, तूने बस एक पहलू देख, फैसला कर लिया। हम वो सूखे हुए नदी का पानी हैं, जिसमें रवानी अभी बाकी है, एक दिन तूफान बन के आएंगे, सब भ्रष्टाचारी को निकल जाएंगे। तेरे जीवन के ग्रह पर ग्रहण बनेंगे हम, बचा सको तो बचा लेना हमसे, छिप कर कही भी रहोगे तुम, हम आठों ग्रहों से तुम्हें खोज निकालेंगे। ये समझने में तुझे बहुत देर होगी, कि सबसे बड़ी ये तेरी भूल होगी, उस शमा को हवा पुछाने चली थी, जो तेल की जगह आंधी पी के जली थी। जिस अग्नि में हम तप रहे हैं, उसी अग्नि में तेरा दाह संस्कार होगा, एके मरेगा तू नहीं, पर मौत से भी बत्तर तेरा हाल होगा।

— shayariprime.com

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